According to Shivkheera --- "If you think that I can do it, then you can do it, if you think that I can not do it, then you can not do it, you are right in both conditions 

शिवखेड़ाj जी कहते है की    ----

"अगर आप सोचते है की मै कर सकता हूँ, तो आप कर सकते है , यदि आप सोचते  है  की  मैi नहीं  कर  सकता  तो  आप  नहीं  कर  सकते  है    आप  दोनों कंडीशन  में  सही है  -----

        What is stammering

Your soul believes then that the weakness of our greatest speech is stammering, but your mind tells you to speak right. Your self-confidence and right-to-speak, being a quarrel or a confrontation between the mind, trying to speak good, thinking of not stopping, is a stammering. The stammering does not happen from birth, but for some reason in the childhood, the baby's respiration system weakens, it starts and the gap between the lung decreases, thus the child's external respiration becomes weak and the child is arrested -walking begins to speak. The child does not want to stop and speak. He has no knowledge of reality, he is stuck-in-the-speak Rather than speaking a weak respiration system, it starts to speak too much. Speaking more increases the speed of the child, and it stops due to the increase of speech. This stopping is called stammering  only.in other word we can define to stammering  "The result of not getting praper combination in speech organ, brain, and desire, is stammering.
Stubbornness in religious and mythological texts has been called Gadgad. In fact the stammering does not happen in the tongue or in the mouth but in the brain. Stutter is of the following type. Stammering varies tremendously from person to person and is highly variable for the person who stammers who may be fluent one minute and struggling to speak the next

                हकलाना क्या है

आपका आत्मा विश्वास तो कहता है कि हमारी सबसे बड़ी बोलने की कमजोरी तो हकलाहट है , लेकिन आपका मन ठीक बोलने को कहता है। आपके आत्मविश्वास और ठीक बोलने को ,कहने वाले मन के बीच झगङा या टकराव का होना ,अच्छा बोलने की कोशिश करना ,न अटकने की सोचना,  ही हकलाहट है। हकलाना जन्म से नही होता है ,बल्कि बचपन में किसी कारण से बच्चे का Respiration System कमजोर होने से इसकी शुरुआत होती है, और फेफड़ो (Lung )के बीच गैप कम हो जाता है इसीलिये बच्चे की External Respiration कमजोर हो जाती है , और बच्चा अटक -अटककर बोलने लगता है। बच्चा रुककर नही बोलना चाहता है। असलियत का उसे ज्ञान नही ,वह अटक -अटककर बोलने के । बजाए कमजोर Respiration System होते  हुए भी ज्यादा बोलने लगता है। ज्यादा बोलने से बच्चे की स्पीड बढ़ जाती है ,और स्पीच बढ़ने की वजह से ही अटकने लगता है। इस अटकने को ही हकलाना कहते है।  दूसरे शब्दों में  स्पीच ऑर्गन्स , ब्रेन  और  चाहत , तीनो में प्रॉपर कंबिनेशन न बन पाने का रिजल्ट ही  स्टम्मेरिंग है
धमिर्क एवं पौराणिक ग्रंथों में हकलाहट को गदगद कहा गया है। वास्तव में हकलाना जीभ या मुँह में नही बलिक दिमाग में होता है। हकलाना निम्न प्रकार का होता है।

                         लोग क्यो हकलाते है ?
इसे महज एक बुरी आदत मानना गलत है सच्चाई यह है कि यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है,जिसमे कुछ ध्वनियों का उच्चारण न सिर्फ मुश्किल कई बार असंभव हों जाता है। जब मसितष्क से ध्वनि के लिये विहुत तरंगे नही पहुचती है तो हमारा कंठ पिछली ही ध्वनि को दोहराता रहता है कभी -कभी गला पूरी तरह ब्लाक हो जाता है ,न ही हवा बाहर निकलता और न ही ध्वनि। एक हकलाने वाले व्यवित के शब्दों में जैसे कि जबड़ा जुबान ,मुँह और कंठ सभी एक पल को जकड़ गये है ,परिणामस्वरूप व्यवित शब्दों को बाहर धकेलने के लिये एक संघर्ष शुरु कर देता है। यह संघर्ष प्रायः चेहरे सिर व बदन में दिखाई पड़ता है जैसे आँखो का झपकना ,चेहरे का एकतरफ ऐठ जाना ,सिर व हाथों का हिलाना ,पाँव पटकना आदि। शुरू में हमने सम्भवतः इन व्यवहारों का प्रयोग था ब्लाकेज से बासर समस्याओं को देती है। मसितष्क के स्केंन द्धारा अध्ययन से पता चला है कि एक हकलाने और एक सामान्य व्यवित जब चुप रहते है, तो उनके में कोई अंतर नही होता लेकिन जब हकलाने वाले बोलने लगते है तो उनकी बाया मसितष्क भय चिंता व अन्य भावनाओं से जुड़ा होता है। कुछ वर्षा पहले तक यह माना जाता था कि बोलने की प्रतिकिर्या पर नियंत्रण करने के लिये दाए व बाए मसितष्क पर संघर्ष होता है जिसके करण हकलाने वाले अटकते है पर अब यह माना जाता है कि दाए मसितष्क का सकिर्य हो जाना हकलाने का कारण नही है बलिक संभवतः उसका परिणाम है। से जुडी तमाम नकारात्मक भावनाएॅ जैसे डर ,शर्म ,आदि बोलने के क्षणों में एक एक सकिय हो जाती है और स्केन के दौरान दाए मसितष्क की हरकत के रूप में दिखाई पड़ती है। हम बोलते समय अपने शब्दों को जैसे डर हम बोलते समय अपने शब्दों को जैसे सुनते है और गले और मुँह की मांसपेशियों को करते हुये जैसा महसूस करते है ,इन दोनो के बीच में तालमेल मसितष्क का एक विशेष आग बैठता है जिसे सेन्ट्रल ऑडिटरी पोर्सेसिंग एरिया कहते है। यह अंग हकलाने के दौरान निषिक्रय हो जाता है। अन्य शब्दों मे अपने शब्दों को चुनना और उसके अनुसार उच्चारण की विभिन्न मांस शेश्यो का तालमेल बैठाना गड़बड़ा जाता है। कुछ बैज्ञानिक बेसल गैगलिया (काडेट न्युबिलयस )में डोपामिन की अधिक्ता को एक कारण मानते है। मसितष्क का यह अंग हमारे विचारेको ध्वनि में बदलने के लिये उपयोग किया जाता है।

                                                                 SURAJ STAMMERING CARE CENTRE  Near badi mai satna road Maihar Distt Satna MP Pin 485771 

                                                                1 Register 2 Location 3- Online Speech therapy 4- Regular therapy 5- Home therapy 6-Basic therapy   7- Hostel 

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